सà¥à¤¹à¤¾à¤—-सौà¤à¤¾à¤—à¥â€à¤¯ से जà¥à¤¡à¤¼à¤¾ है गणगौर, शिव-पारà¥à¤µà¤¤à¥€ देते हैं आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦...
चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² तृतीया को धूमधाम से गणगौर परà¥à¤µ मनाया जाता है. इसे गौरी तृतीया à¤à¥€ कहते हैं. ये परà¥à¤µ विशेष तौर पर महिलाओं के लिठहोता है. इस दिन महिलाà¤à¤‚ शिव-पारà¥à¤µà¤¤à¥€ की अराधना करती हैं. कहा जाता है कि इस दिन à¤à¤—वान शिव ने पारà¥à¤µà¤¤à¥€ जी को और फिर पारà¥à¤µà¤¤à¥€ जी ने समसà¥à¤¤ सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€-समाज को सौà¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ का वरदान दिया था. इस दिन सà¥à¤¹à¤¾à¤—िनें वà¥à¤°à¤¤ रखती हैं.
कब से आरंठहोती है पूजा
गणगौर की पूजा होली के दूसरे दिन (चैतà¥à¤° कृषà¥à¤£ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤ªà¤¦à¤¾) से आरंठहो जाती है. इस दिन से महिलाà¤à¤‚ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ गणगौर को पूजती हैं और चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯à¤¾ (सिंजारे) के दिन नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर पूजी हà¥à¤ˆ गणगौरों को पानी पिलाती हैं. इसके बाद अगले दिन शाम को उनका विसरà¥à¤œà¤¨ किया जाता है.
कà¥à¤¯à¤¾ करते हैं आज
चैतà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² तृतीया को गौरी-शिव को सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ कराकर, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤‚दर वसà¥à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤à¥‚षण पहनाकर डोल या पालने में बिठाया जाता है. फिर शाम को à¤à¤• शोà¤à¤¾à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ के रूप में गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसरà¥à¤œà¤¿à¤¤ किया जाता है. विसरà¥à¤œà¤¨ के बाद उपवास खोला जाता है. पूजन में मां गौरी के दस रà¥à¤ªà¥‹à¤‚ की पूजा की जाती है.
सà¥à¤¹à¤¾à¤— और सौà¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ से जà¥à¤¡à¤¼à¤¾ है वà¥à¤°à¤¤
कहा जाता है कि नवविवाहित सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को सà¥à¤¹à¤¾à¤— और सौà¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ की कामना से गणगौर वà¥à¤°à¤¤ करना चाहिà¤. सोलह या अठारह दिनों तक मां गणगौर का और ईशरजी का पूजन करने के बाद उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ विदा करना चाहिà¤. ये वà¥à¤°à¤¤ विवाहित सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के लिठपति का अनà¥à¤°à¤¾à¤— पैदा करने वाला माना जाता है. गणगौर अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ 'गण' यानी कि शिव और 'गौर' अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ पारà¥à¤µà¤¤à¥€.
कà¥à¤¯à¤¾ पहनती हैं सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚
इस दिन पचरंगी ओà¥à¤¨à¥€ व साड़ी पहनी जाती है. सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ विशेष तौर पर हाथ-पांव में मेंहदी रचाती हैं. गणगौर का उतà¥à¤¸à¤µ घेवर के बिना अधूरा माना जाता है. खीर ,चूरमा, पूड़ी, मठरी से ईसर-गणगौर को जिमाया जाता है. आटे और बेसन के जेवर गणगौर माता को चà¥à¤¾à¤ जाते हैं.
राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में खूब मनाया जाता है
ये तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° खास तौर पर राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में मनाया जाता है. राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ से लगे बà¥à¤°à¤œ के सीमावरà¥à¤¤à¥€ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर à¤à¥€ यह तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° धूमधाम से मनाया जाता है. राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में कहावत à¤à¥€ है, 'तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर' अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ सावन की तीज से तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ का आगमन शà¥à¤°à¥‚ हो जाता है और गणगौर के विसरà¥à¤œà¤¨ के साथ चार महीनों का विराम लगता है.