Homeअपना शहर ,खास खबरे,
कलाओं में शोध: समस्या एवं सम्भावनाऐं पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन

ग्वालियर। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर द्वारा द्विदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार एवं शोधार्थियों की वार्षिक प्रगति आख्या कार्यक्रम का शुभारम्भ आज सोमवार 29 जनवरी 18 को तानसेन सभागार में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. उमाशंकर पचौरी थे। मुख्य वक्ता के रूप में संगीत नाटक अकादमी के पूर्व सचिव प्रो. भारत रत्न भार्गव उपस्थित थे। सेमिनार का आयोजन ''कलाओं में शोध: समस्या एवं सम्भावनाऐं विषय पर किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शोधार्थी उनके द्वारा किए गए कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट भी प्रस्तुत करेंगे। इस आयोजन का संयोजन डॉ. हिमांशु द्विवेदी एवं सह संयोजन डॉ. संजय सिंह एवं डॉ. विनोद कटारे द्वारा किया जा रहा है।
कार्यक्रम का उद्घाटन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. उमाशंकर पचौरी ने अपने उदबोधन में कहा कि शोधार्थी का शोध कार्य पूर्णत: मौलिक होना चाहिए। शोध की समस्याओं पर चर्चा करते हुए आपने कहा कि वर्तमान में शोध हेतु श्रद्धा एवं विश्वास का अभाव दिखाई देता है। श्रद्धा एवं विश्वास के बिना ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। कलाओं के सम्बन्ध में आपने कहा कि कलाएं जीवन में हमें आत्म तत्व से परिचित कराती हैं। कलाओं के माध्यम से जीवन के व्यवहारिक पक्ष को प्रस्तुत किया जाता है। प्राचीन परम्पराओं को नवीन अनुसंधानों के माध्यम से प्रस्तुत करना शोध का क्षेत्र है।
मुख्य वक्ता प्रो. भारत रत्न भार्गव ने अपने उदबोधन में कहा कि जो तत्व जीवन को समृद्ध, उत्सर्जित एवं उन्नत बनाते हैं वे कलाओं की श्रेणी में आते हैं। कलाओं के माध्यम से नवरसों की अभिव्यक्ति की जाती है। उन्होने कहा कि शोध शब्द शुद्ध से बना है। शोधार्थी को अपने शोध विषय की गहनता में जाकर तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। शोधार्थी का उद्देश्य शोध कार्य में आलोचनात्मक न होकर विश्लेष्णात्मक होना चाहिए। समस्त कलाओं का समावेश भारतीय संस्कृति एवं कलाएं हैं शोध के माध्यम से परम्पराओं को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। भारतीय कलाएं प्रतीकात्मकता पर आधारित हैं।
उदघाटन सत्र के पश्चात् संगीत एवं नाट्य विषय के शोधार्थियों द्वारा अपनी प्रगति आख्या प्रस्तुत की गईं। कानपुर की शोधार्थी कु. प्रगति राठौर ने अपने विषय रामकथा पर आधारित अवधी लोकगीतों का सांगीतिक स्वरूप, जम्मू कश्मीर की प्रियंका शर्मा ने भारतीय वाद्यों की परम्परा में संतूर वाद्य, ग्वालियर की स्वाति बिरथरे ने भातखण्डे द्वारा हर रंग उपनाम से रचित बंदिशों का विश्लेष्णात्मक अध्ययन, आगरा की आभा पारया ने मिर्जा गालिब द्वारा रचित गजलों के दार्शनिक एवं सांगीतिक पक्ष पर एक अध्ययन, धीरज सोनी ने आधुनिक भारतीय रंगमंच में अभिनय सिद्धांतों का प्रयोग एक विश्लेष्णात्मक अध्ययन विषयों पर उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की।
उधर कार्यशाला में कल 30 जनवरी 18 को मुख्य वक्ता प्रो. भारत रत्न भार्गव के उदबोधन के पश्चात् नृत्य एवं ललित कला विषयों के शोधार्थी अपनी वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे।
आज के आयोजन में अतिथियों के साथ प्रो. रंजना टोणपे, प्रभारी कुलसचिव अजय शर्मा, परीक्षा प्रभारी, समस्त विभागों के प्रभारी विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने किया।

Share This News :