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तीन तलाक पर बेहद मुश्किल हैं एक औरत के इन तीन सवालों के जवाब?

रात के करीब दो-ढाई बज रहे थे। घर का माहौल पहले से ही बहुत ग़मगीन था। घर की बेटी का घर ऐसी जगह ‘बसा था’ जिसके कभी भी उजड़ने के आसार थे, और उस दिन वही हुआ जिसका अंदेशा था। दिलों में दहशत थी। लाड़ से पली बेटी को उसका पढ़ा-लिखा क़ाबिल शौहर, गले में तलाक़ की तख़्ती लटका के घर पर ऐसे पटक गया था, जैसे कोई बेकार सामान हो। उस दिन ऐसा नहीं लगा जैसे किसी का तलाक़ हुआ है, बल्कि ऐसा लगा जैसे किसी की मौत हुई है। वैसे ही मौत जो रिश्तों की टूटने पर होती है, संबंधों के बिखरने पर होती है , प्यार और भरोसे के टूट जाने पर होती है।
शादी से पहले जिस बेटी पर बाप ने एक शिकन तक बर्दाश्त नहीं की थी, आज उस पर क़यामत टूटी थी। क़रीब-करीब पागल सी हो गई इस बेटी के लिए ये बता पाना भारी पड़ रहा था कि वो अब एक तलाक़शुदा है।
मुस्लिम परिवार में पैदाइश के बावजूद किसी तरह की रोक नहीं, न पढ़ाई में, न ही रहन-सहन में, न कभी लड़का-लड़की का फर्क महसूस किया, ना जबरन बुर्क़ा या पर्दे की बंदिश, नाज़ों से पली जिस बेटी को ये नहीं पता था कि वो किस मज़हब की है, उस पर तलाक़ की चाबुक चलाकर शौहर ने जता दिया कि वो एक ऐसे शौहर की बीवी है, जिसके हाथ में हजार झगड़ों को एक पल में ही हल करने का औज़ार है, और वो है तलाक़....तलाक़...तलाक़।
ये हक़ीकत है, या कहानी, मुद्दा ये नहीं है, बल्कि मुद्दा ये है कि क्‍या तीन तलाक़ को अपना औज़ार समझ बैठने की ग़लती करने वाले मुसलमान शौहर तलाक देने से पहले जरा भी भावनाओं को इस स्‍तर पर जाकर समझते हैं?क्या वाकई तलाक़ की तासीर ऐसी है, जो किसी भी जीते-जागते इंसान को ज़िन्दा लाश बना दे?
वैसे यहां मैं सिर्फ और सिर्फ तलाक़ की बात कर रही हूं, इसके मज़हब की नहीं क्योंकि मज़हब कोई भी हो, तलाक़ मरते रिश्तों की आख़िरी मंजिल होती है। लेकिन चर्चा-ए-आम तीन तलाक़ पर है, तो मेरे भी तीन तलाक़ पर तीन सवाल हैं।
1- क्या तीन तलाक़ रिश्तों को पकड़ने की, उन्हें थामने की, उन्हें फिर से एक बार सुधारने की गुंजाइश के ख़त्म होने के बाद ही शौहर के हलक़ से बीवी के मुंह पर फेंका जाता है? या फिर शौहर इस्लाम में दिए एक ऐसे हक़ को अपनी जागीर समझ कर इस्तेमाल करता है, जो खुदा को भी नापसंद है?
2- दूसरा सवाल ये कि इस मुद्दे पर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड क्यों चौधरी बन रहा है? क्या मुस्‍लिम महिलाओं ने उनसे इस पर कोई मदद मांगी है (ये मैं सच में नहीं जानती) आपसे तह-ए-दिल से गुज़ारिश है कि अगर आप सच में मुस्लिम महिलाओं के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो उनके लिए बेहतर इल्म (कॅरियर और शरई दोनों) के लिए आवाज़ बुंलद करें, क्योंकि खुद मुस्लिम महिलाओं को ही अपने हक और हकूक़ के बारे में जानकारी नहीं है।3-अब सवाल यूनिफॉर्म कोड का, क्योंकि इस चिराग़ से ही तीन तलाक का जिन्न बाहर आया है। ग़लत ना समझें, लेकिन चुनावी मौसम में इस मुद्दे पर बहस क्या मुसलमानों के दिलों में शक नहीं डाल रही कि आख़िर मंशा क्या है? क्या वाकई लड़ाई हक़ दिलाने की है, या फिर निशाना कुछ और साधने की है।
अगर नहीं, तो बधाई, वर्ना आपका ईमान..!
बहरहाल, यहां तो सवाल तीन ही पेश किए हैं, लेकिन दिल में तीन सौ बाक़ी रह गए हैं, जिन्हें फिर कभी मौका मिलने पर पेश किया जाएगा। कुल मिलाकर बदलते दौर में इस्लाम, जिसे अक्सर मज़हब के साथ ही जीने का तरीका माना जाता है, उसे पढ़ा जाए, समझा जाए तो जिंदगी में वैसे ही अमन आ जाएगा, जबकि तीन तलाक जैसे बेहद घरेलु मसलों पर मुल्ला-मौलानाओं के पास फतवे लेने जाने से पहले एक बार घर-परिवार में बुजुर्गों से सलाह मश्‍विरा कर लिया जाए तो यह मामला भी घर की दहलीज में ही सुलझ जाए।
कुल मिलाकर, मेरी तो उन आलिमों से ग़ुज़ारिश है, जो वाकई इस्लाम की 'सही जानकारी' रखते हैं, लेकिन खुद में ही समेटे दुनिया से रुख़सत हो जाते हैं, वे अब लोगों के बीच पहुंचना शुरू करें,उन्‍हें बताएं कि इस्‍लाम क्‍या है? वह किस तरह से जिंदगी को रौशन करता है?
यकीनन आज ज़रूरत है कि दीन के बेशक़़ीमती सरमाए को मुस्लिम समाज के बीच फैलाया जाए, वर्ना, मुसलमान, ख़ासकर औरतें, यूं ही शौहरों और बोर्ड की मोहताज बनी रहेंगी।

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