Homeअपना शहर ,खास खबरे,
तानसेन समारोह : झील की लहरों की मानिद फिज़ा में उठीं स्वर लहरियाँ

ग्वालियर । झील में उठती लहरों की मानिद अठखेलियाँ करतीं सरोद की झंकार से निकली मीठी-मीठी धुनें, बुलंद और सुरीली आवाज में घरानेदार गायकी। साथ ही भारतीय राग-रागनियों के साथ समागम करती रशिया व यूरोपियन देशों की धुनें। यहाँ बात हो रही है भारतीय शास्त्रीय संगीत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित महोत्सव “तानसेन समारोह” के तहत रविवार को सजी प्रात:कालीन सभा की। इस सभा में संगीत मनीषियों ने अपने गायन-वादन से रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तानसेन समारोह में रविवार की प्रातःकालीन सभा का आगाज़ महारुद्र मण्डल संगीत महाविद्यालय के ध्रुपद गायन से हुआ। महाविद्यालय के विद्यार्थियों व आचार्यों ने राग भैरव में चौताल में निबद्ध बंदिश "विष्णु चरनन" पेश की।

अधरों पर बांसुरी का नाम आते ही कानों में मिश्री घुल जाती है। तानसेन समारोह में रशियन कलाकारों ने इसे प्रत्यक्ष महसूस कराया। सुदूर देश रशिया से आए मिखैल युशैनिन ने अपनी बांसुरी से सुरीली तान छोड़ी तो एक बारगी लगा हिमाच्छादित पहाड़ों से कल-कल करते असंख्य झरने फूट पड़े हैं। कानों में मिश्री सी मीठी मीठी असीम शांति समा गई। हालांकि भारतीय बांसुरी लकड़ी की और रशिया की धातु से बनी होती है। छेद विन्यास भी दोनों के अलहदा हैं। मगर दोनों का भाव एक है। वह है प्रेम और शांति का। मिखैल ने अपने बांसुरी वादन में इसे साबित भी किया। उनकी बांसुरी से खिंच रही तान और लय ने रसिकों को प्रकृति के बीच ला खड़ा कर दिया। उन्हें सुधीय श्रोताओं की खूब वाहवाही मिली। रविवार की सभा के वे पहले कलाकार थे।
मिखैल छः वर्ष की अल्प आयु से ही बांसुरी वादन कर रहे हैं। अभी तक वे एक हज़ार से ज्यादा सफल प्रस्तुतियां दी चुके हैं। तानसेन समारोह में उनके साथ पियानो पर नागालैंड के देनोबो रिंता ने प्रभावी संगत की। यूँ भी संगीत व कला के क्षेत्र में रशिया के साथ भारत का सदैव से गहरा नाता रहा है। सिने अभिनेता एवं निर्देशक स्व. राज कपूर की फिल्में और उनके गीतों ने रशिया में खूब धूम मचाई थी।जबलपुर से पधारीं श्रीमती दुर्गा शर्मा के वायोलिन वादन से फूटे सुर ह्रदय को छू गए। तानसेन समारोह में रविवार को प्रातःकालीन सभा की वह दूसरी कलाकार थीं। उन्होंने राग 'चारुकेशी' में एक ताल में विलंबित धुन निकाली। राग की सिलसिलेवार बढ़त सुनते ही बन रही थी। राग चारुकेशी मूलतः कर्नाटक यानि दक्षिण भारत का राग है । मगर उत्तर भारत के संगीत साधकों ने भी इसे बड़े आदर के साथ अपनाया है। कहा जाता है संगीत दिलों को जोड़ता है। उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति आज तानसेन समारोह में हुई। राग चारुकेशी में दुर्गा शर्मा के वायोलिन वादन ने उत्तर-दक्षिण के बीच प्रेम- शांति का सेतु बना दिया। उन्होंने अपने वादन को आगे बढ़ाते हुए राग देश में एक मधुर धुन निकाली। इतवार की छुट्टी होने से बड़ी संख्या में आए रसिक उनके वायोलिन वादन के सम्मोहन में बंधे बैठे रहे। उनके साथ तबले पर श्री भोगीराम रतोनिया ने बड़ी नफासत के साथ संगत की।
सुश्री दुर्गा शर्मा परंपरागत ख्याल अंग की वादन शैली में प्रवीण हैं। उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कला का जादू बिखेरा है। श्रीमती शर्मा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य की इकलौती वायोलिन वादक हैं, जो कर्नाटक शैली के प्रसिद्ध संगीतज्ञों में शुमार की जाती हैं।

 

Share This News :